16 February 2026

कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल के इतिहास विभाग में संवादात्मक व्याख्यान का हुआ आयोजन

0
naini-public
pine-crest

नैनीताल। इतिहास विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल द्वारा आज एक विशेष संवादात्मक व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र एवं सेवानिवृत्त कर्नल (डॉ.) गिरिजा शंकर मुनगली मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। यह कार्यक्रम विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए जीवन-दर्शन, अकादमिक दृष्टि और सामाजिक उत्तरदायित्व को समझने का एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ।
अपने वक्तव्य में कर्नल (डॉ.) गिरिजा शंकर मुनगली ने कहा कि जीवन में प्रेरणा का मूल स्रोत व्यक्ति के भीतर निहित होता है, किंतु उसे सुदृढ़ करने के लिए अनुशासन, निरंतर अभ्यास और स्पष्ट लक्ष्य अनिवार्य हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को निर्णय-क्षमता विकसित करने तथा कठिन परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों से समझौता न करने की प्रेरणा दी। उनके अनुसार, जीवन के चुनौतीपूर्ण क्षण ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का वास्तविक निर्माण करते हैं।
उन्होंने कहा कि साहस और धैर्य के बिना कोई भी व्यक्ति दीर्घकालिक सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। साथ ही, बुद्धि और विवेक के संतुलन से लिए गए निर्णय न केवल व्यक्तिगत जीवन को दिशा देते हैं, बल्कि व्यक्ति को वैश्विक स्तर का नेतृत्वकर्ता बनने में भी सहायक होते हैं। उन्होंने नेतृत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सफलता के लिए नेतृत्वकारी गुणों का विकास आवश्यक है, क्योंकि एक सक्षम नेतृत्व ही सामूहिक क्षमता को सार्थक उपलब्धियों में परिवर्तित कर सकता है।
कर्नल (डॉ.) मुनगली ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में इतिहास जैसे विषयों को अंतरविषयक दृष्टिकोण से पढ़ना अत्यंत आवश्यक है। समाजशास्त्र, भूगोल, पर्यावरण अध्ययन एवं राजनीति विज्ञान के साथ इतिहास को जोड़कर देखने से अतीत की घटनाओं की व्यापक एवं समग्र समझ विकसित होती है। उन्होंने विद्यार्थियों को यह संदेश दिया कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि संवेदनशील, जागरूक और उत्तरदायी नागरिक बनने की प्रक्रिया है। संवादात्मक सत्र के दौरान विद्यार्थियों ने करियर निर्माण, शोध की दिशा, विदेश अध्ययन तथा जीवन में संतुलन जैसे विषयों पर प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर कर्नल (डॉ.) मुनगली ने अपने दीर्घ अनुभवों के आधार पर दिया। उन्होंने कहा कि असफलताएँ व्यक्ति को सशक्त बनाती हैं और आत्ममंथन से ही व्यक्तित्व का समुचित विकास संभव है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. (कर्नल) दीवान एस. रावत ने कहा कि कर्नल (डॉ.) मुनगली का जीवन विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन भी उसका अभिन्न अंग है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र को सदैव प्रथम रखकर कार्य करना चाहिए। साथ ही, उन्होंने बहुविषयक दृष्टिकोण को अकादमिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक बताया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. संजय घिल्डियाल ने मुख्य वक्ता का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कर्नल (डॉ.) गिरिजा शंकर मुनगली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं तथा संस्थान से उनका अकादमिक एवं भावनात्मक जुड़ाव अत्यंत गहरा रहा है। वे इतिहास विषय के छात्र रहे हैं और 1990 के दशक में उन्होंने पीएचडी हेतु शोध कार्य प्रारम्भ किया था। उन्होंने कहा कि पूर्व छात्रों का पुनः विश्वविद्यालय में आकर विद्यार्थियों से संवाद करना विश्वविद्यालय की सशक्त अकादमिक परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने विश्वविद्यालयों में छात्रों में विश्लेषणात्मक क्षमता के विकास के महत्व को इंगित किया व आशा व्यक्त की कि इस संवादात्मक प्रयास से विद्यार्थियों में ये क्षमता बढ़ेगी।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. रीतेश साह ने मुख्य वक्ता, कुलपति, विभागाध्यक्ष तथा उपस्थित सभी शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया और भविष्य में भी इस प्रकार के संवादात्मक एवं प्रेरक कार्यक्रमों के आयोजन की आशा व्यक्त की।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. शिवानी रावत द्वारा किया गया।
इस अवसर पर प्रो. सावित्री क़ैड़ा जंतवाल, प्रो. संजय टम्टा, प्रो. एच.सी.एस. बिष्ट, प्रो. आर.सी. जोशी, प्रो. ज्योति जोशी, प्रो. मनीषा, प्रो. हरिप्रिया, डॉ. गगनदीप होती, डॉ. रवि जोशी, डॉ जितेंद्र, डॉ हिमांशु, डॉ हृदेश,डॉ. पूरन अधिकारी, डॉ. भुवन शर्मा, डॉ. हरदयाल सहित विश्वविद्यालय के अनेक वरिष्ठ शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

kc-chandola
sanjay
amita

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

यह भी पढ़ें…

error: Content is protected !!