राणा प्रताप मार्ग स्थित लखनऊ सत्संग भवन तथा बिजनौर (लखनऊ) स्थित प्रेम सरन नगर की सत्संगी कॉलोनी में बसंत–2026 का उत्सव मनाया धूमधाम,

नैनीताल। राणा प्रताप मार्ग स्थित लखनऊ सत्संग भवन तथा बिजनौर (लखनऊ) स्थित प्रेम सरन नगर की सत्संगी कॉलोनी में बसंत–2026 का उत्सव धूमधाम से मनाया गया, जिसमें बच्चों की सहभागिता विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।
ऋतु बसंत आए सतगुरु जग में, चलो चरन पर सीस धरो री।
प्रे.भा. राकेश सिंह, ब्रांच सेक्रेटरी लखनऊ के अनुसार, वर्ष 2026 में बसंत पंचमी का पावन पर्व राधास्वामी मत के मुख्यालय दयालबाग सहित भारत एवं विदेशों में स्थित सतसंगी समुदाय द्वारा प्रेम, भक्ति एवं उल्लास के साथ मनाया गया। यह पावन अवसर निष्काम सेवा के शाश्वत आदर्श के प्रति नवचेतन समर्पण का प्रतीक है। निस्वार्थ सेवा का लक्ष्य तथा फल की आसक्ति से रहित कर्तव्यपालन दयालबाग जीवनशैली का प्रमुख मूल आधार है।
प्रे.भा. एच.एन. सिंह ने बताया कि दयालबाग में प्रत्येक दिन की शुरुआत भगवद् गीता के शाश्वत संदेश के साथ होती है:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
इस शाश्वत सिद्धांत से प्रेरित होकर दयालबाग में कर्म एवं कर्तव्यपरायणता को विशेष महत्व दिया जाता है। यहाँ प्रत्येक दिन सूर्योदय से पूर्व प्रातः 3 बजे सायरन की गूंज के साथ आरंभ होता है, जो निवासियों को कृषि क्षेत्रों में निष्काम सेवा हेतु प्रेरित करता है। आध्यात्मिक अनुशासन एवं रचनात्मक श्रम का यह समन्वय बसंत उत्सव को विशेष गरिमा प्रदान करता है।
माघ माह (जनवरी–फरवरी) में आने वाला बसंत पंचमी का पर्व नवजीवन, आनंद एवं सृजन का प्रतीक है। शीत ऋतु के उपरांत बसंत के आगमन से पशु, पक्षी, मानव और वनस्पति जगत में नवचेतना का संचार होता है। संतों ने इसे परम पुरुष के सृष्टि में प्राकट्य के लिए अत्यंत उपयुक्त ऋतु माना है।
देखो देखो सखी अब चल बसंत, फूल रही रई तैं बसंत।
डॉ नेहाल रज़ा के अनुसार भारत की साझा आध्यात्मिक परंपरा में बसंत पंचमी का विशेष स्थान है। इसी क्रम में निज़ामुद्दीन दरगाह में भी बसंत पंचमी का पर्व विशेष श्रद्धा और प्रेम के साथ मनाया जाता है, जिसकी परंपरा महान सूफ़ी कवि अमीर खुसरो से जुड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि अपने प्रिय गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के गहरे शोक को हरने हेतु अमीर खुसरो बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र धारण कर, हाथों में पीले फूल लेकर उपस्थित हुए। बसंत के उल्लास से भरे उस दृश्य ने गुरु के मुख पर पुनः मुस्कान लौटा दी। तभी से यह पर्व गुरु-शिष्य प्रेम, आशा और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक बन गया, जो आज भी बसंत पंचमी की सार्वभौमिक भावना को दर्शाता है।
आगरा स्थित दयालबाग के लिए बसंत पंचमी का पर्व अत्यंत विशेष महत्व रखता है। 15 फरवरी 1861 को बसंत पंचमी के दिन राधास्वामी मत के प्रथम आचार्य परम पुरुष पूज्य धनी स्वामीजी महाराज ने जगत उद्धार का संदेश दिया और आम सत्संग का प्रारंभ किया।
घट में खेले ब्रज बसंत। वेद बताय सतगुरु संत॥
20 जनवरी 1915 को बसंत पंचमी के दिन पाँचवें आचार्य परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज द्वारा पौधारोपण के साथ दयालबाग की नींव रखी गई। तत्पश्चात 1 जनवरी 1916 को राधास्वामी एजुकेशनल इंस्टिट्यूट की स्थापना हुई, जो आगे चलकर दयालबाग एजुकेशनल इंस्टिट्यूट (DEI) के रूप में एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय बना।
आज आई बहार बसंत।
उमंग मन गुरु चरन लिपट्या।
बसंत उत्सव की तैयारियाँ बहुत पहले से प्रारंभ हो जाती हैं। बच्चे, युवा और बुजुर्ग मिलकर अपने घरों एवं पूरे दयालबाग परिसर की सफाई और सजावट करते हैं। बसंत पंचमी के दिन “जयघोष” कार्यक्रम के अंतर्गत वर्तमान संत सतगुरु के पावन चरणों में बैठकर आरती, पूजा, अभ्यास एवं कृतज्ञता अर्पित की जाती है।
बसंत–2026 के अवसर पर परम पूज्य वर्तमान संत सतगुरु प्रो. प्रेम सरन सतसंगी साहब द्वारा दयालबाग कॉलोनियों, सरन आश्रम अस्पताल, स्कूल, डेयरी एवं स्वामीबाग महाप्रबंध समाज का दौरा किया गया। उनकी पावन उपस्थिति से आध्यात्मिक आनंद एवं नवउत्साह का संचार हुआ।
समारोह के दौरान 3 सप्ताह से 12 वर्ष तक के बच्चों द्वारा योग, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, आत्म-सुरक्षा प्रदर्शन, बेबी शो, फैंसी ड्रेस, जिम्नास्टिक एवं खेलकूद प्रतियोगिताएँ आयोजित की गईं। प्रेरणादायक नारे “Bravo Supremal Octavo” के साथ राधास्वामी नाम चारों दिशाओं में गूंज उठा।
मोहि मिल गए राधास्वामी गुरु संत। अब बाजत हिये में धुन अनन्त॥
रात्रि में भारत एवं विदेशों की सत्संगी कॉलोनियों को सजावटी LED लाइट्स से प्रकाशित किया गया। पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिगत सौर एवं नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग किया गया।
इस प्रकार बसंत–2026 का यह पर्व दयालबाग में आध्यात्मिकता, अनुशासित सामूहिक जीवन, निष्काम सेवा, सादा जीवन और मानव मात्र के प्रति करुणा भाव के साथ भव्य रूप से संपन्न हुआ।








