6 November 2026

इस वर्ष- बसंत पंचमी 23 जनवरी, शुक्रवार को मनाई जाएगी ।बसंत पंचमी पर विशेष, आलेख- प्रोफेसर ललित तिवारी,

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इस वर्ष- बसंत पंचमी 23 जनवरी, शुक्रवार को मनाई जाएगी ।बसंत पंचमी पर विशेष, आलेख- प्रोफेसर ललित तिवारी,
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नैनीताल। ऋतु राज बसंत का आगमन  प्रकृति की सुंदरता एवं मानवीय स्नेह को  बतलाता है इसीलिए  कहा गया है आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहावें।
बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती  की आराधना और ज्ञान प्राप्ति के लिए  “सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि विद्यारंभं करिष्यामि सिद्धिर् भवतु मे सदा” , “ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः” , और “या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”   मंत्रों का   जाप करने से बुद्धि, विद्या और एकाग्रता  ,रचनात्मकता बढ़ती है.
बसंत पंचमी से  होली  में श्रृंगार  जुड़ जाता है जो  बसंत ऋतु से जुड़े हैं और इनका आपस में गहरा संबंध है।
  बसंत ऋतु के आगमन , ज्ञान, कला और संगीत की देवी सरस्वती की पूजा का दिन है। यह होली से 40 दिन पहले आता है । बसंत पंचमी बसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है तो  होली बसंत ऋतु  समाप्ति का प्रतीक है। दोनों त्योहार मिलकर बसंत ऋतु की पूरी यात्रा  पूर्ण करते है । बसंत पंचमी के दिन
ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने देखा कि सब कुछ शांत और निर्जीव है। तब उन्होंने अपने कमल से एक शक्ति का आविर्भाव किया, जो सरस्वती देवी थीं। सरस्वती ने अपनी वीणा से ध्वनि उत्पन्न की, जिससे सृष्टि में जीवन की शुरुआत हुई।
बसंत पंचमी के दिन ही  भगवान कृष्ण ने राधा को  उपहार दिया था। इसी दिन शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था, लेकिन बाद में कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना पर शिव ने उन्हें पुनः जीवन दिया।
बसंत पंचमी प्रेम, ज्ञान और सृजन का त्योहार है।
जो  माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन ज्ञान, कला और संगीत की देवी सरस्वती के जन्म का प्रतीक है। इस दिन लोग पीले रंग के कपड़े पहनते हैं, पीली चीजें अर्पित करते हैं और मां सरस्वती की पूजा करते हैं

  • इस दिन  की पूजा से जीवन के अंधकार का नाश होता है और सभी कामों में सफलता मिलती है। बच्चों की शिक्षा की शुरुआत के लिए यह दिन बेहद शुभ माना जाता है  तथा  नए कार्यों का शुभारंभ ,जनेऊ संस्कार ,विवाह कर लिए यह दिन  शुभ  माना जाता है ।बसंत पंचमी   सरसों के खेतों के साथ  देवी सरस्वती  में शामिल है  जहां  बसंत स्वयं प्रकृति के चमकीले रंगों, जैसे नारंगी, गुलाबी, हल्के हरे  रंगों  में समाई होती  है, जो जीवन, ताजगी और उत्सव का संदेश देती है इसीलिए इसे ‘ऋतुराज’ कहा जाता है और यह हरियाली और फूलों के खिलने का मौसम है। बसंत पंचमी का पीला रंग ताजगी, ऊर्जा, खुशी और नई शुरुआत का प्रतीक है इस ऋतु में  सरसों के खेत पीले फूलों से ढके होते हैं, जिससे यह रंग प्रकृति, समृद्धि और सकारात्मकता का प्राकृतिक प्रतीक बन जाता है
    जो प्रकृति के नव-जीवन  के साथ   रंग ऊर्जा, उत्साह, उमंग और  ठंड के बाद  जीवन में नया जोश भरता है । पीला रंग सुख-समृद्धि और सौभाग्य का सूचक माना जाता है ।
    श्रीकृष्ण ने पीतांबर धारण कर सरस्वती पूजा की थी, इसलिए बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनना और पीले फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसका
    मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी है  पीला रंग दिमाग को सक्रिय करता है और डिप्रेशन को कम करके आत्मविश्वास बढ़ाता है, जो बसंत के उल्लासपूर्ण वातावरण   को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है ।
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